दोस्ती पर कविता | सखा | दया | प्रेम | ईर्ष्या एवं क्रोध

यह दोस्ती पर कविता पढ़कर आपको अवश्य ही अपनी बचपन की दोस्ती याद आ जाएगी। अपने बचपन का खास सखा अथवा सहेली की याद , उसकी तस्वीर आपकी आँखों में एक पल के लिए ठहर जाएगी। कच्चे धागे से बंधी हमारी बचपन की दोस्ती के बीच में प्रतिस्पर्धा , ईर्ष्या , क्रोध पलभर में ही ओझल हो जाते थे। दया , प्रेम एवं सहयोग से हम एक -दूसरे को सदा ही प्रसन्नचित एवं आनन्दित देखना चाहते थे। हमारी दोस्ती में किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होता था। 

दोस्ती 

यह कविता दो दोस्तों के बीच घटित है। सामान्य जीवन से प्रगति की राह पर बड़े ही संघर्ष के साथ एक दोस्त आगे बढ़ जाता है। जबकि दूसरा संघर्ष एवं परिश्रम पर विश्वास न करते हुए व्यक्तिगत सामान्य उन्नति से बहुत पीछे रह जाता है। जीवन में परिश्रमी व्यक्ति के विचारो में कोई बदलाव नहीं होता है बल्कि जीवन में निरंतर संघर्षी एवं परिश्रमी होने से उसके विचारो में अधिक निखार आ जाता है। 
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सखा


जीवन की गहराई में जाकर,
कुछ क्षण तुमसे बात करके,
पूछ लिया हाल सखा तुम्हारा।


बचपन के तुम सखा पाकर,
कसूर दिल का समझा करके,
गुजरा समय कवि असहाय तुम्हारा।


तीर जुंबा पर है तुम्हारी ,
आँखों से तुम  हे ! सखा ,
मत बना मुझे तू आज निशाना।
नई परीक्षा है तुम्हारी,


मेरी यादों को दिल मे बसाकर,
दोस्ती की तुम आज कसम निभाना।
उठकर मैं ईश्वर की प्रार्थना कर के,


 द्वंद  के लिए तू सखा है तैयार।
कुंठित मन प्यासा कवि,
पकड़ लिया सखा तुमने अपना हथियार।।


गुजरा समय कवि असहाय तुम्हारा।
आज देख लिया हाल सखा तुम्हारा।।


सहारा बना जिस सखा का हमेशा,
सुबह की खोज में निकले कवि,
पहली सूर्य किरण देखकर,
कवि असहज होकर गिर पड़े.........


धरती ने आज गोद में उठाकर पुकारा,
आत्मा तेरी हे ! कवि, सूर्य किरणों में जगा।

तेरी गोद में मिल गया सहारा,
आँचल हे ! धरती माँ......
आँसुओ से आज तेरा भीगा।।


उठाया है जिसे तूने गोद में माँ,
तुझसे कह रहा है कवि,
गोद में कितने असहाय सखा,
असहज होकर गिर पड़े.......
क्योंकि

इस जीवन का ईश्वर कुम्हार,
कवि कच्ची मिटटी का गमला।
महापुरुष ज्ञान रूपी माली,
मैं गुरु गले मे फूलों की माला।।

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                                             - ईश्वर तड़ियाल "प्रश्न"

(यह कविता मेरी काव्य पुस्तक "ईश्वर" से संकलित है)


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10 टिप्पणियाँ

  1. दिल को छू लेने वाली कविता, बहुत सुंदर

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