मौन कविता | अनीता ध्यानी

इस कविता में कवयित्री उन लफ़्जों ,उन शब्दों की बात कर रही हैं ,जो बिना ध्वनि के हैं,लेकिन जिनका प्रभाव ध्वनि से कई गुना अधिक होता है। जो हृदय से निकलकर हृदय तक पहुंचते हैं। जिन्हें हम सुन नहीं सकते बस महसूस कर सकते हैं। जो प्रेम से जन्म लेकर प्रेम में ही विलीन होते हैं। उन अलिखे शब्दों को तुम कभी पढ पाये क्या ?

तुमने पढ़ी क्या ?
मैंने लिखी थी जो कविता।


बिना शब्द के
बिन आवाज की
मौन कविता।

प्रतिध्वनित होती
जिसकी खामोशियाँ
शून्य से टकराकर
बिना आवाज किये

पढ़ पाये थे क्या तुम
वो मौन उदासियाँ

जो शब्दों से बयाँ
नहीं हो सकती
महसूस होती हैं
जो दिल की गहराइयों मेँ
- कवयित्री अनीता ध्यानी







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